• बातचीत
  • भाषाशास्त्री कुशाग्र अनिकेत से प्रचण्ड प्रवीर की बातचीत

    श्री कुशाग्र अनिकेत अर्थशास्त्री और मैनेजमेण्ट कंस्लटेण्ट होने के अतिरिक्त भाषाशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान हैँ। इनकी शिक्षा-दीक्षा न्यूयॉर्क कॉर्नेल और कोलम्बिया विश्वविद्यालयों मेँ हुई। सम्प्रति न्यूयॉर्क मेँ ही रहते हैँ। उन्होँने नित्यानंद मिश्र के सह-लेखन मेँ ‘कृष्ण-नीति’ (2024) नाम की चर्चित पुस्तक लिखी है। वे अंग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत और पालि के अतिरिक्त भारतविद्या, पुरातत्त्व और भाषा विज्ञान मेँ रुचि रखते हैँ। जानकीपुल के पाठकोँ के लिए उनसे प्रचण्ड प्रवीर की बातचीत – मॉडरेटर

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    प्रश्न १: प्रथम प्रश्न यह उठता है कि क्या भाषाविज्ञानियोँ की हिन्दी मेँ कोई आवश्यकता शेष है? क्या वे कोई प्रासङ्गिक भूमिका निभा सकते हैँ? इस प्रश्न की पृष्ठभूमि यह है कि भारत के किसी ‘न्यूज चैनल’ मेँ न तो शुद्ध हिन्दी शेष बची है और न ही शुद्ध उच्चारण। हिन्दी मेँ इतने विदेशज शब्द आकर रुढ़ हो चुके हैँ कि व्युत्पत्तिशास्त्र की उपयोगिता लगती ही नहीँ। इसके अलावा यह तथ्य है कि अधिकांश हिन्दी के पठन-पाठन करने वालोँ को न संस्कृत आती है, न ही फारसी और न ही अरबी। कुल मिला कर हिन्दी अध्ययन-अध्यापन-वाचन-पाठन स्वच्छन्दता और मुक्ताचार का विषय है। इसमेँ भाषा विज्ञान की क्या उपयोगिता है?

    उत्तर: जब मैंने भाषा-विज्ञान पर शोध करना प्रारंभ किया, उसके पीछे मूल कारण था हिंदी के शब्दों की रचना और इतिहास को समझना। सामाजिक संचार माध्यमों से मेरे पास अनेक लोगों के प्रश्न आते रहते थे, जिनमें अधिकांश प्रश्न हिंदीभाषियों के ही थे। जैसे – जब सुस्वागत = सु + आगत, तो क्या उसमें पुनः “सु” लगाकर “सुस्वागत” बना सकते हैं? प्रसिद्ध धर्म-ग्रंथ “गीता” को “गीता” ही क्यों कहते हैं, “गीत” क्यों नहीं? दीपोत्सव को “दिवाली” कहें अथवा “दीवाली”? दूसरी ओर हिंदीभाषी क्षेत्रों की विभिन्न बोलियों और भाषाओं से संबद्ध प्रश्न भी मुझे मिलते रहते थे, जैसे – राजस्थान में भोजन को “जीमन” और अवधी में “जेवनार” क्यों कहते हैं?

    इन प्रश्नों को देखने से दो बातें स्पष्ट होती हैं। एक तो यह कि यद्यपि सामान्य हिंदीभाषी के पास अन्य भाषाओं का बहुत ज्ञान नहीं है, तथापि उसके मन में अच्छी हिंदी सीखने की इच्छा है। दूसरी बात यह कि अब तक भारतीय भाषाओं से संबद्ध अनेक मूलभूत प्रश्नों का संतोषप्रद समाधान नहीं हो सका है। इन दोनों कारणों से हिंदी में भी भाषा-विज्ञान की आवश्यकता प्रतीत होती है।

    आज की हिंदी में विदेशज शब्दों के आने से व्युत्पत्ति-शास्त्र की उपयोगिता समाप्त नहीं होती, प्रत्युत बढ़ती है। क्या संस्कृत में विदेशी शब्द नहीं हैं? कई प्रचलित संस्कृत शब्द, जैसे “केंद्र” और “दीनार”, ग्रीक और लैटिन भाषाओं से आए हैं। वहीं “पिक” (कोयल) और “तामरस” (कमल) जैसे शब्द संस्कृतेतर भारतीय भाषाओं के हैं। प्राचीन काल के आचार्यों (जैसे वराहमिहिर और शबर) से लेकर आज के सामान्य पाठकों तक लोगों की इन शब्दों की यात्रा में जिज्ञासा रही है।

    प्रश्न २: मैँ मानता हूँ कि हिन्दी; तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और संस्कृत की तरह एक शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा नहीँ है क्योंकि इसमेँ कोई समादृत ‘शास्त्र’ नहीँ मिलता। आपके विचार में क्या हिंदी एक शास्त्रीय भाषा है? क्या हिंदी का व्याकरण एक शास्त्रीय भाषा के व्याकरण के उपयुक्त है?

    उत्तर: मेरे अनुसार हिंदी एक शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा है किंतु वह वर्तमान मानकों पर खरी नहीं उतरती है।

    २०२४ के सरकारी मानकों के अनुसार हिंदी केवल इसलिए एक शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा नहीं मानी गई है, क्योंकि हिंदी के आदि साहित्य को आधुनिक हिंदी से अलग देखा जाता है। यहाँ तक कि ब्रजभाषा और अवधी को भी आधुनिक हिंदी से भिन्न माना जाता है। विलक्षण बात तो यह है कि मध्यकाल की इन भाषाओं की उत्तराधिकारिणी भाषा हिंदी ही है।

    वहीं बांग्ला, उड़िया और असमिया जैसी भाषाओं के लिए अपभ्रंश साहित्य की गिनती की जाती है। दक्षिण की चारों प्रमुख भाषाओं को शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा की मान्यता प्राप्त है, जबकि इनमें से अधिकांश का व्याकरण स्पष्टतः संस्कृत व्याकरण पर आधारित है। कहीं संस्कृत-व्याकरण के नियमों की अनुकृति की गई है तो कहीं उन्हें किंचित् परिवर्तित कर साहसपूर्वक बैठाने का प्रयास। यही तो हिंदी व्याकरण की स्थिति है।
    चारों दाक्षिणात्य भाषाओं में मराठी और उड़िया भी जोड़ दें तो विंध्य के दक्षिणी क्षेत्र की सभी प्रमुख भाषाएँ आज शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषाएँ हैं, किंतु उत्तर भारत के विस्तृत भूभाग की एक भी वर्तमान भाषा इस पदवी के योग्य नहीं समझी गई है। यदि हिंदी नहीं तो कम-से-कम सरहपाद की अंगिका को ही शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा मान लेते। किंतु अंगिका को तो सरकार बोली मानती है, अतः उसे शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा की मान्यता कैसे दे पाएगी? इसी प्रकार ब्रजभाषा और अवधी के द्वार भी बंद हैं।
    शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा के मानकों में सिद्ध साहित्य को उड़िया का आदि साहित्य माना जाता है, किंतु हिंदी का नहीं। मेरा मानना है कि कुछ ही वर्षों में बांग्ला और उड़िया के समान मैथिली भी अपभ्रंश साहित्य के बल पर शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा की मान्यता प्राप्त कर लेगी, किंतु हिंदी पीछे रह जाएगी।
    जहाँ तक बात शास्त्र की है तो हिंदी का अपना साहित्य-शास्त्र मिलता है। किंतु इससे महत्त्वपूर्ण तो यह है कि पिछले १५० वर्षों से हिंदी भारत में शास्त्र-चर्चा की प्रधान भाषा बनी हुई है। संस्कृत, प्राकृत और पाली में निबद्ध शास्त्रों के सर्वाधिक अनुवाद इसी भाषा में हुए हैं। आधुनिक शास्त्रों (जैसे अर्थशास्त्र अथवा समाज-शास्त्र) पर सभी भारतीय भाषाओं में से सर्वाधिक चिंतन हिंदी में ही होता है। फिर यह कैसे मान लिया जाए कि हिंदी में शास्त्र नहीं है?
    ये उदाहरण दर्शाते हैं कि शास्त्रीय (क्लासिकल) के मानक ऐच्छिक हैं। ये मानक तीन बार (२००४, २००५, और २०२४) परिवर्तित भी किए जा चुके हैं। मानकों में परिवर्तन किसी सैद्धांतिक आधार पर नहीं, अपितु विशिष्ट भाषाओं को मान्यता प्रदान करने के लिए होता रहा है। अतः यदि हिंदीभाषी चाहेंगे तो हिंदी भी शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा बन जाएगी।

    प्रश्न ३:  आप बहुधा संस्कृत व्याकरण की बात करते हैँ। क्या पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ का आधुनिक भाषाविज्ञान और फॉर्मल लॉजिक मेँ कोई योगदान है? यदि है तो पाठकों के लिए संक्षेप मेँ बताएँ।

    उत्तर: कुछ लोग ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र का उद्गम भारत की भूमि को मानते हैं, जो उचित नहीं है। किंतु यदि हम कहें कि व्याकरण और भाषाविज्ञान का आविर्भाव यास्क के निरुक्त और पाणिनि की अष्टाध्यायी से ही हुआ है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कुछ अत्युत्साही जन संस्कृत को “सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा” की उपाधि तो दे देते हैं किंतु पाणिनि-व्याकरण की वैज्ञानिकता को नहीं पहचानते। वस्तुतः पाणिनि एक भाषा-वैज्ञानिक थे। उन्होंने सर्वप्रथम अपने समय में उपलब्ध सभी प्रकार की भाषा-संबंधी “डेटा” (data) को एकत्र किया। फिर उस “डेटा” का विश्लेषण कर अल्प से अल्प शब्दों में ऐसे सूत्र अथवा नियम बनाए जिनसे इस “डेटा” को समझाया जा सके। तदनंतर उन्होंने अपने सूत्रों को एक विशेष क्रम में व्यवस्थित किया जिनसे उनका अंतःसंबंध स्थापित हो सका। यहीं से भाषा में पूर्वापर, विकल्प और अपवाद की परंपरा चल निकली। प्रायः आधुनिक भाषा-वैज्ञानिक भी इसी प्रणाली से कार्य करते हैं। यही पाणिनि का सबसे बड़ा योगदान है।
    आधुनिक भाषा विज्ञान की दृष्टि में पाणिनि-व्याकरण उत्पादनकारी (generative) है, क्योंकि वह धातुओं से शब्दों, शब्दों से पदों और पदों से वाक्यों की रचना करता है। रचना का संचालन सूत्रों में दिए नियमों से होता है। प्रत्येक सूत्र एक प्रक्रिया को दर्शाता है। संगणकीय नियम-आधारित भाषाओं में भी ऐसा ही होता है। पाणिनि के प्रत्याहारों की संक्षिप्तता और उपयोगिता से आधुनिक भाषा-वैज्ञानिक बहुत प्रभावित हुए हैं। यदि फार्मल लॉजिक की बात करें तो पाणिनि को नियम-आधारित तर्क-प्रणाली (rule-based logic system), पुनरावृत्ति (recursion), और परिनियम (meta-rule) का जनक मानना चाहिए।

    प्रश्न ४:   आपने ‘जैमिनीय अश्वमेध’ के अवधी अनुवाद की खोज एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी है। यह कितना पुराना है? आप इसे महत्त्वपूर्ण क्योँ समझते हैँ? क्या भारत मेँ ‘कैथी लिपि’ का कोई उपयोग रह गया है जो इस काव्य की चर्चा भी की जाए?

    उत्तर: अभी पिछले ही माह हमारे सहयोगी श्री प्रीतम कुमार (शोधछात्र, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) को कैथी लिपि में निबद्ध एक पांडुलिपि प्राप्त हुई। प्रीतम कैथी लिपि के विशेषज्ञ हैं, अतः उन्होंने पांडुलिपि के कुछ अंशों का देवनागरी रूपांतरण कर मेरे पास विश्लेषण हेतु भेजा। जब मैंने पांडुलिपि के पढ़ना प्रारंभ किया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
    जैसा कि हम जानते हैं, वर्तमान में उपलब्ध महाभारत की कथा महर्षि व्यास के शिष्य वैशम्पायन द्वारा जनमेजय को सुनाई गई थी। किंतु महर्षि व्यास के अन्य ३ शिष्य (सुमन्तु, पैल और जैमिनि) भी थे जिन्होंने महाभारत का अपना-अपना संस्करण बनाया था। इन शिष्यों में से केवल महर्षि जैमिनि द्वारा प्रणीत महाभारत का एक अंश मिलता है जो “जैमिनीय अश्वमेध” के नाम से प्रसिद्ध है। यह वैशम्पायन द्वारा सुनाए गए प्रचलित महाभारत के अश्वमेध पर्व से बहुत बड़ा है।
    हमें जो पांडुलिपि प्राप्त हुई है वह इसी जैमिनीय अश्वमेध का अवधी में काव्यानुवाद है। रचयिता हैं १६ वीं शताब्दी के अवधी कवि ईश्वरदास, जो गोस्वामी तुलसीदास के पूर्ववर्ती हैं। मेरे संज्ञान में यह हिंदी में महाभारत के किसी अंश का सबसे प्राचीन अनुवाद है। इसके पूर्व केवल तेलुगु भाषा में कवि-त्रय के द्वारा महाभारत का अनुवाद (आन्ध्रमहाभारतम्) किया गया था। इस ग्रंथ की एक अन्य विशेषता यह है कि यह अवध क्षेत्र में मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। अब इस पांडुलिपि का पाठोद्धार, अनुवाद और संपादन मेरी देख-रेख में चल रहा है।

    प्रश्न ५ : कुशाग्र जी, आपने शिलालेख अध्ययन पर भी बहुत काम किया है। क्या आप इसके बारे में हमें बता सकते हैं? क्या शिलालेखों के अध्ययन से भी हमारी भाषा की समझ का परिष्कार किया जा सकता है?

    उत्तर: शिलालेखों की ओर मेरा ध्यान बीते वर्ष गया जब हमारे एक पुरातत्त्वविद् सहयोगी को प्रयागराज के समीप गढ़वा दुर्ग में एक ११ वीं शताब्दी के चंदेल राजवंश का शिलालेख प्राप्त हुआ। मैंने इस शिलालेख का संपादन और अनुवाद किया है। इस शिलालेख में श्रीराम के वनगमन से जुड़े स्थान पर चैत्र शुक्ल एकादशी को “राघवयात्रा” नामक उत्सव संपन्न होने और एक मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। यह शिलालेख रामोपसना के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण है और रामनवमी से संबद्ध उत्सवों का प्राचीनतम पुरातात्त्विक प्रमाण है।
    गढ़वा शिलालेख के अतिरिक्त मैंने दो अन्य ताम्रपत्रीय अभिलेखों का संपादन किया है। इनमें से एक चौथी शताब्दी का गुप्तकालीन ताम्रपत्र है जो समुद्रगुप्त द्वारा गुजरात के जीते जाने का पहला प्रमाण प्रस्तुत करता है। दूसरा ताम्रपत्र १३ वीं शताब्दी का है, जिसके विषय में हमें सूचना तब मिली जब वह न्यू यार्क में नीलामी के लिए प्रस्तुत किया गया। खेद की बात है कि भारत सरकार हमारी पुरातात्त्विक संपदा की तस्करी पर नियंत्रण नहीं पा सकी है। १२ वीं शताब्दी के एक अन्य ताम्रपत्र पर हमारा शोध अभी चल रहा है, जो राष्ट्रकूट राजवंश से संबद्ध है। राष्ट्रकूटों के इतिहास को समझने के लिए यह ताम्रपत्र बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
    भाषा में रुचि रखने वालों के लिए शिलालेख बहुमूल्य रत्नों से कम नहीं है। जो बात लिखित ग्रंथों में नहीं मिलती है, वह शिलालेखों में प्राप्त हो जाती है। जहाँ ग्रंथों का कालनिर्णय बहुधा विवादित रहता है, वहीं अधिकांश शिलालेखों का कालनिर्णय तुरंत हो जाता है। खेद की बात है कि शिलालेखीय साहित्य पर साहित्यविदों और भाषाशास्त्रियों ने ध्यान कम दिया है। इसे केवल पुरातत्त्वविदों का क्षेत्र मानकर उपेक्षित छोड़ दिया गया है। यह सच है कि शिलालेखों को लिखने और लिखवाने वाले शासक और शिक्षित वर्ग के लोग होते थे। किंतु प्रायः ये शिलालेख सामान्य लोगों को सूचित करने के लिए लिखे जाते थे। अतः शिलालेखीय साहित्य में हमें तत्कालीन लोकभाषाओं की झलक देखने को मिलती है। हिंदी में अनेक ऐसे शब्द हैं जो संस्कृत के ग्रंथों में दुर्लभ हैं, जैसे “जीमन”, “ठाकुर” (“ठक्कुर”) और “संत”। किंतु ये शब्द शिलालेखीय साहित्य में स्थान-स्थान पर प्राप्त होते हैं। इन शब्दों के प्रयोग और इतिहास को जानने के लिए शिलालेखों का अध्ययन करना आवश्यक है।

    प्रश्न ६: पिछले दिनोँ हिन्दी साहित्य मेँ ‘ऋष्यशृङ्ग की ख़राब कविताएँ’ बड़ी चर्चित रहीँ। उसकी पहली ही कविता की पङ्क्ति विवादास्पद रही – “आपकी तारीफ कर रहा हूँ और आप नाराज़ हो रही हैँ? / ऐसा क्योँ? / क्या ग़लत कहा मैँने जब मैँ यह कहता हूँ कि/आपकी गालोँ की लालिमा/ बन्दर के नितम्ब की तरह है। /यह छान्दोग्य उपनिषद मेँ प्रयुक्त उपमा है। आपने छान्दोग्य उपनिषद् के इस वाक्य के सन्दर्भ मेँ आलेख भी लिखा था। क्या आप पाठकों को इस शास्त्रीय विवाद के बारे संक्षेप मेँ बताना चाहेँगे?

    उत्तर: छान्दोग्योपनिषद्‌ (१.६.७) में ईश्वर के नेत्र-युगल को “कप्यास पुण्डरीक” की उपमा दी गई है – “तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी” अर्थात् “उसके नेत्र कप्यास पुण्डरीक के ही जैसे हैं”। “पुण्डरीक” का सामान्य अर्थ कमल होता है। किंतु यह “कप्यास” क्या है? आचार्य शंकर ने “कप्यास पुण्डरीक” का अर्थ “कपि के पृष्ठ-भाग के समान रक्तवर्ण कमल” किया है। कथा है कि अपने अद्वैत-वेदांती गुरु यादवप्रकाश से इसी अर्थ को सुनकर श्रीरामानुजाचार्य बहुत दुःखी हुए थे। वे “कप्यास” में “कपि” का अर्थ “बंदर” नहीं अपितु “सूर्य” मानते थे। श्रीरामानुजाचार्य के अनुसार “कप्यास पुण्डरीक” का अर्थ “सूर्य के द्वारा खिलने वाला कमल” है। तत्पश्चात् दोनों संप्रदायों के मध्य एक सुदीर्घ विवाद छिड़ गया, जिसका अब तक समाधान नहीं हो सका है। मेरी आगामी पुस्तक “भाषा का संसार” में इस “कप्यास” शब्द पर भी एक अध्याय सम्मिलित है जिसमें दोनों पक्षों के तर्कों की समीक्षा का गई है। यह विवाद व्याकरण, निरुक्त, न्याय और मीमांसा जैसे विद्यास्थानों से होते हुए अब आधुनिक भाषाविज्ञान तक आ पहुँचा है।
    “कप्यास” श्रुति का एक समाधान मैंने प्रस्तुत किया है, जिसे स्वीकार करने में उभय पक्ष के सिद्धांतों की कोई हानि नहीं है। यह समाधान “कपि” के प्राचीन प्रयोगों पर आधारित है, जिनमें “कपि” का एक अर्थ “कपिल-वर्ण” (लाल-भूरा रंग) भी है। “कपि” का यह वर्णात्मक अर्थ वेदों के “वृषाकपि” (संभवतः सूर्य का नाम), “कपिंजल”, “कपिल” और “कपिश” जैसे शब्दों में निहित है। वहीं कुछ समस्त पदों, जैसे “कपिपिप्पली” (सूर्यावर्त वृक्ष), “कपिलोह” (पीतल) और “कपिशीर्षक” (हिंगुल) में भी “कपि” का अर्थ “वानर” नहीं, अपितु लाल-भूरा रंग है। संस्कृत के उणादि-सूत्र (४.१४४) “कुडिकम्प्योर्नलोपश्च” से “कपि” शब्द की सिद्धि दिखाई गई है। इस सूत्र की अनेक टीकाओं में “कपि” शब्द के दो अर्थ दिए गए हैं – वानर और वर्ण का नाम। अब यदि बहुव्रीहि समास के रूप में “कप्यास” की पुनर्व्याख्या की जाए तो उसका अर्थ होगा – कपिल वर्ण का आसन (निचला भाग) है जिसका। यह शब्द “पुण्डरीक” का विशेषण है। इससे ज्ञात होता है कि वैदिक काल में “कप्यास” कोई विशिष्ट प्रकार का “पुण्डरीक” अथवा कमल रहा होगा।
    यदि “कपि” का अर्थ “वानर” ही करने का आग्रह हो, तब भी एक अन्य समाधान दिया जा सकता है। संस्कृत में “कपि”, “नाग”, “गज”, “अश्व” आदि सामान्य जंतुओं के नामों पर विशिष्ट फूल-पौधों के नाम रखने की पुरानी परंपरा है। यही पद्धति पाली, अँग्रेज़ी, हिंदी, चीनी और अरबी समेत विश्व की अनेक भाषाओं में पाई जाती है। कई बार जंतु के नाम का पौधे से कोई संबंध नहीं होता है, जैसे “नागकेसर” और “अश्वगंधा” का नाग और अश्व से कोई सीधा संबंध नहीं है। यदि कभी संबंध रहा भी हो तो अब प्रयोग में भुला दिया गया है। “कप्यास” भी इसी कोटि का शब्द है। अतः कप्यास को कमल की एक विशिष्ट प्रजाति मानने में आपत्ति नहीं है।

    प्रश्न ७: संस्कृत के अधिकांश शब्दोँ मेँ धातु, उपसर्ग और प्रत्यय का रूप रहा है। लेकिन सभी शब्द ऐसे नहीँ रहे हैँ। क्या ऐसा ही कुछ प्राकृत, पालि और अपभ्रंश मेँ भी रहा है?

    उत्तर: संस्कृत में शब्दों को देखने की दो परंपराएँ विद्यमान हैं। पहली परंपरा निरुक्त की है, जो प्रत्येक शब्द को किसी-न-किसी धातु से व्युत्पन्न मानती है। इस परंपरा का ध्येय पहले से बने (प्रायः वैदिक) शब्दों का निर्वचन करना है। यह परंपरा पुराणों से लेकर आज सामान्य बोलचाल में भी दिखाई देती है। उदाहरणस्वरूप निरुक्तपरिभाषा में “गुरु” शब्द का निर्वचन “गु+रु” के रूप में दिया गया है, जहाँ “गु” का अर्थ “अंधकार” और “रु” का अर्थ “रोकनेवाला” है। अतः अंधकार के निरोधक को गुरु कहते हैं। दूसरी परंपरा व्याकरण की है, जिसमें पूर्वनिर्मित शब्दों की सिद्धि के साथ-साथ नए शब्दों की रचना की जाती है। इस परंपरा के अग्रणी महर्षि पाणिनि अनेक शब्दों को अव्युत्पन्न मानने और यथावत् स्वीकार करने के पक्षधर हैं। व्याकरण-परंपरा में “गुरु” शब्द को अव्युत्पन्न मानने में कोई समस्या नहीं है। प्राकृत और अपभ्रंश में अव्युत्पन्न शब्दों की संख्या संस्कृत से अधिक ही है, क्योंकि इनमें संस्कृत के तद्भव शब्दों के अतिरिक्त अनेक देशज और विदेशज शब्द भी सम्मिलित हैं। किंतु किसी शब्द के अव्युत्पन्न होने का यह अर्थ नहीं कि उसके अर्थ अथवा इतिहास पर कोई चर्चा नहीं की जाए। आचार्य हेमचंद्र ने १२ वीं शताब्दी में ही “देशीनाममाला” नामक ४००० देशज शब्दों का एक बृहत् कोश बनाया था। इस कोश के अनेक शब्दों को प्रकृति-प्रत्यय के द्वारा समझाया नहीं जा सकता, किंतु वे शताब्दियों से प्राकृत भाषाओं के अंग रहे हैं।

    प्रश्न ८: हिन्दी भाषा मेँ ‘रहा है-रही है’ जैसे प्रयोग सीधे संस्कृत से नहीँ आए। इनका उद्गम कहाँ से है? क्या आप हिन्दी कुछ प्रमुख वृत्तियोँ का उदाहरण दे सकते हैँ जो कि संस्कृत से न हो कर अपभ्रंश और प्राकृत से हमारे दैनन्दिन प्रयोग मेँ विद्यमान हैँ।

    हिंदी की अनेक वृत्तियों का उद्गम प्राकृत और अपभ्रंश से हुआ है। संस्कृत में “राम जा रहा है” और “राम जाता है” – दोनों के लिए “रामो गच्छति” कहेंगे। किंतु हिंदी में इन वाक्यों में भेद है। अर्वाचीन संस्कृत में कुछ लोग “रामो गच्छन् अस्ति” कहने लगे हैं किंतु यह संस्कृत की मूल प्रवृत्ति नहीं है। हिंदी में “रहना” एक सहायक क्रिया है जिसका प्रयोग निरंतरता दर्शाने के लिए होता है।
    “रहना” क्रिया संस्कृत की किस धातु से बनी है? यह प्रश्न विचारणीय है। वस्तुतः यह प्राकृत के “रहइ” से आई है। प्राकृत के “रहइ” की उत्पत्ति के विषय में मतभेद है। कुछ विद्वान् इसे संस्कृत के “राज्” धातु (“विराजना” / “सुशोभित होना”) से उत्पन्न मानते हैं। दूसरा मत संस्कृत के धातु “रह्” (“त्यागना”) से इसकी उत्पत्ति मानता है, किंतु “रहता है” और “रहति” (“त्यागता है”) में अर्थ साम्य नहीं है। तृतीय मत में “विरहयति” (“छुड़ा देता है”) से वि-उपसर्ग को निकाल देने से “रहना” क्रिया की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि तब “रहयति” का अर्थ “रहने देता है” किया जा सकता है। किंतु यह भी कल्पित ही प्रतीत होता है।
    हिंदी में अन्य सहायक क्रियाएँ भी हैं – “चुकना” (“खा चुका”), “डालना” (“मार डाला”), “देना” (“बोल दिया”), “आना” (“ले आया”), “जाना” (“खा गया”), “बैठना” (“उठ बैठा”), “पड़ना” (“गिर पड़ा”)। इस प्रकार की क्रमबद्ध क्रियाएँ संस्कृत में नहीं हैं। इनका विकास प्रायः अपभ्रंश से हुआ है। हिंदी की एक अन्य प्रवृत्ति है विभक्तियों के साथ परसर्गों का प्रयोग, जैसे का/के/की + साथ/बाद/लिए। यह प्रवृत्ति भी संस्कृत में नहीं पाई जाती है।

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