अगर आप यात्रा वृत्तांत लिखना चाहते हैं तो इस लेख को ज़रूर पढ़ना चाहिए। यह लेख भूमिका है असग़र वजाहत की किताब ‘अतीत का दरवाज़ा’ की। राजपाल एंड संज से प्रकाशित इस किताब में असग़र वजाहत द्वारा लिखे जॉर्डन, मारमारोश और मेक्सिको की यात्राओं के वृत्तांत हैं। आप इसकी भूमिका पढ़िए, जो अपने आप में यात्रा वृत्तांत या संस्मरण लिखने के बहुत सारे सूत्र देता है- मॉडरेटर
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आजकल यात्रा संस्मरण लिखना कुछ मुश्किल हो गया है, क्योंकि सूचनाएँ प्राप्त करने की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कोई भी व्यक्ति घर बैठे इन्टरनेट पर पूरी दुनिया की सैर कर सकता है। किसी भी शहर और वहाँ की इमारतों को देख सकता है। तमाम तरह की जानकारियाँ प्राप्त हो सकती हैं। घर बैठे विश्व के बड़े संग्रहालयों को देखा जा सकता है। इन्टरनेट युग से पहले यात्रा संस्मरणों का जो स्वरूप था, वह अब बदल चुका है। केवल शहरों और इमारतों या यात्रा के सामान्य विवरण पाठक को आकर्षित नहीं कर पाते। आज के यात्रा संस्मरण में पाठक वह देखना चाहता है जो उसे किसी दूसरे माध्यम से नहीं दिखाई पड़ता, इसलिए यात्रा संस्मरण लिखने वाले का काम काफ़ी मुश्किल हो गया है। ‘ग्लोबल विलेज़’ बन जाने के कारण देश एक-दूसरे के इतने निकट आ गये हैं कि सब कुछ जाना-पहचाना लगता है।
मुझे याद है आज से लगभग कोई चालीस साल पहले की बात है, मैं अमेरिका गया था और वहाँ तीन महीने रहा था। यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। उस ज़माने में हिन्दी की एक बहुत प्रतिष्ठत पत्रिका दिनमान के सम्पादक प्रसिद्ध हिन्दी कवि और पत्रकार रघुवीर सहाय थे। मैंने सहाय जी से कहा था कि मैं अपनी अमेरिकी यात्रा में दिनमान के लिये कुछ यात्रा संस्मरण लिखना चाहता हूँ। मेरे इस प्रस्ताव पर सहाय जी ने पूछा था कि क्या जाने से पहले या यात्रा के दौरान मैंने यह तय कर लिया था कि मैं इस यात्रा के संस्मरण लिखूँगा। उस समय सहाय जी का यह सवाल मुझे कुछ अटपटा लगा था, लेकिन आज यह सवाल बहुत उचित लगता है। यात्रा के कई उद्देश्य हो सकते हैं। कुछ लोग सैर-सपाटे के लिये “यात्राएँ करते हैं। कुछ व्यापार से सम्बन्धित यात्राओं पर जाते रहते हैं। बहुत से लोग अपने सम्बन्धियों से मिलने भी विदेश जाते हैं। विदेश में शिक्षा प्राप्त करना तो अब आम बात हो गयी है। मुद्दा यह है कि यात्रा करने से पहले यदि यह नहीं तय किया गया कि यात्रा का उद्देश्य क्या है तो यात्रा संस्मरण लिखना कठिन हो जायेगा।
आज यात्रा संस्मरण लिखने वाला लेखक न तो मध्यकालीन पर्यटकों की तरह पूरा जीवन यात्रा में बिता सकता है और न यात्राएँ करने के लिये नयी-नयी भाषाएँ सीख़ सकता है। मध्यकाल या उससे पहले यात्राएँ करना जितना जोख़िम भरा हुआ करता था, उतना अब नहीं है। कुछ घंटों के अन्दर आदमी दुनिया के इस कोने से उस कोने में पहुँच सकता है।
आज के यात्री के लिये यह आवश्यक हो गया है कि वह जिस देश की यात्रा कर रहा है उस देश के समाज और संस्कृति के उन पक्षों पर ध्यान दे जो सामान्य रूप से दिखाई नहीं पड़ते। इससे पहले भी मैंने कई जगह लिखा है कि मैं टूरिस्ट नहीं बल्कि सोशल टूरिस्ट हूँ। आज “सोशियल टूरिस्ट हुए बिना यात्रा संस्मरण लिखना बहुत कठिन है। सोशियल टूरिस्ट का अर्थ दरअसल ऐसे पर्यटन से है जो इमारतों और सड़कों, संग्रहालयों या अकादमियों, होटलों या क्लबों, मनोरंजन और खेलकूद तक सीमित न हो। सोशियल टूरिस्ट देश और समाज की छिपी हुई राशियों को समझने की कोशिश करता है। बहुत सामान्य से सामान्य लगने वाले ‘ऑब्ज़र्वेशन’ दरअसल सामाजिक संरचना और लोगों के मनोविज्ञान को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिये अपनी ईरान यात्रा के दौरान मैंने देखा था कि वहाँ कुत्ते पालने का रिवाज़ नहीं है। सड़कों पर कुत्ते नहीं दिखाई देते। यह समझ में आने वाली बात है, क्योंकि इस्लाम में कुत्ते को गन्दा जानवर माना जाता है लेकिन ईरान में मैंने बहुत बड़ी और महँगी कारों के अन्दर यदा-कदा कुत्ते देखे। इसके अतिरिक्त कभी-कभी अत्यन्त गरीब और सड़क पर रहने वाले ख़ानाबदोश लोगों के पास भी कुत्ते नज़र आये। इससे यह समझने में मदद मिली कि सामान्य से हटकर ईरान में या तो बहुत धनवान लोग रह सकते हैं या बहुत गरीब लोग। साधारण मध्यवर्ग के लोग सामान्य से अलग नहीं हो सकते।
जब मैं अमेरिका गया था तब आम तौर पर शहरों में प्रायः अफ्रीकी मूल (ब्लैक) के लोग छोटे-मोटे काम करते दिखाई पड़ते थे। रात के समय ये लोग अक्सर राहगीरों को रोककर उनसे पैसे माँगते थे। मैं इस बात से बहुत परेशान था। एक दिन अचानक एक भारतीय मूल के व्यक्ति से इस समस्या के बारे में बात हुई तो उसने बताया कि ब्लैक लोगों से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि उन्हें सम्मान दिया जाये। मैंने यह नुस्ख़ा आज़मा कर देखा। एक रात एक लम्बे-चौड़े और नशे में धुत्त ब्लैक ने मेरा रास्ता रोक कर जब पैसे माँगे तो मैंने उसे ‘सर’ कहकर बातचीत शुरू की। एक वाक्य में दो बार ‘सर’ का प्रयोग किया और नतीजा यह निकला कि उसने मुझे छोड़ दिया। सन् 1974 के बाद मैं 2000 में दूसरी बार अमेरिका गया तो यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बड़ी संख्या में ‘ब्लैक’ वर्किंग मिडिल क्लास के लोग दिखाई पड़े। इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकन समाज ने ‘ब्लैक’ समुदाय को आगे आने का मौका दिया है।
कभी-कभी कहा जाता है कि यदि आप किसी देश की भाषा नहीं जानते तो आप वहाँ के समाज को कैसे समझ सकते हैं? टूरिस्ट यदि भाषा जानता है तो उसे बहुत अधिक जानकारियाँ मिल सकती हैं। लेकिन भाषा न जानने के बाद भी समाज का गहन निरीक्षण भी समाज और देश को समझने में मददगार सिद्ध होता है। उदाहरण के लिये तेहरान के एक चौराहे पर मैंने एक युवक को पार्क की एक बेंच पर बैठे देखा था। इस युवक ने बहुत आधुनिक किस्म के कपड़े पहन रखे थे। उसके बाल भी बहुत लेटेस्ट फैशन के थे। वह कानों में एयर फ़ोन लगाये अपने मोबाइल से कुछ सुन रहा था। उसके हुलिये को देखकर यह अनुमान होता था कि वह शायद पश्चिमी संगीत सुन रहा होगा। युवक की आँखें बन्द थीं और सबसे अद्भुत बात यह थी कि उसके हाथ में तस्बीह (नमाज़ आदि के बाद पवित्र नाम गिनने के लिये प्रयोग किये जाने वाली माला) थी। पूरा दृश्य यह बताता था कि युवक के लिये धर्म का क्या अर्थ है। इसी तरह तेहरान विश्वविद्यालय में ज़ुम्मे की नमाज़ के लिये जाने वाले लोगों को देखकर भी उस समाज के धार्मिक आधार का पता चला था। नमाज़ के लिये अन्दर जाने के दो गेट थे। एक गेट से साधारण लोग अन्दर जा रहे थे जिनकी तलाशी आदि ली जा रही थी और दूसरे गेट से बड़ी-बड़ी कारें अन्दर जा रही थीं। पहले गेट से अन्दर जाने वाले निम्न या निम्न मध्यवर्ग के लोग ही लगते थे।
कुछ लोग शायद यह मानते हैं कि घूमने के लिये बहुत पैसा चाहिए होता है, लेकिन मेरे विचार से पैसे से अधिक इच्छा और लगन आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति यात्रा करना चाहता है तो उसे सैकड़ों मददगार मिल जाते हैं और वह कम-से-कम पैसे में या कभी-कभी तो बिना पैसे के भी यात्राएँ कर सकता है। उदाहरण के लिये मैं इस्फहान शहर के एक होटल में ठहरने गया। होटलवाले ने कमरे का जो किराया बताया वह मेरे हिसाब से बहुत अधिक था। मैंने उससे कहा कि मैं इतना किराया नहीं दे सकता। जब मैं जाने लगा तो उसने मुझे रोका और कहा कि मैं केवल पाँच डॉलर देकर डॉरमेट्री में भी रह सकता हूँ। मैंने डॉरमेट्री में रात बितायी और सोचा कि काफ़ी कम पैसे में रात बीत गयी। कमरे से बाहर निकला तो देखा
होटल के बरामदे में ज़मीन पर साइकिलवाले टूरिस्ट अपने-अपने स्लीपिंग बैगों में घुसे सो रहे हैं। मैंने सोचा, ‘इन लोगों ने मुझसे भी कम पैसे में रात बितायी होगी।’ शहर में घूमता हुआ एक पार्क में पहुँचा तो देखा एक टूरिस्ट पेड़ के नीचे स्लीपिंग बैग में सो रहा था। निश्चित रूप से उसने सबसे कम पैसे या मुफ़्त में रात बितायी होगी। कहने का मतलब यह है कि सबके लिये सब तरह की गुंजाइश होती है, इसलिए यात्रा करने वालों को, पर्यटकों को कम पैसे होने के कारण घबराना नहीं चाहिए। एक प्रसिद्ध शे’र है—
सफ़र है शर्त मुसाविर नवाज़ बहुतेरे
हज़ार-हा शजरे-सायादार राह में हैं।
मतलब, शर्त यह है कि कोई सफ़र करे। उसे नवाज़ने वाले अर्थात् उसकी सहायता करने वाले अनेकों मिल जायेंगे। उसी प्रकार जैसे रास्ते में हज़ारों छायादार पेड़ मिलते हैं।


बहुत अच्छी सीख।