मछली मरी हुई से The Dead Fish तक

1960 के दशक में राजकमल चौधरी का उपन्यास मछली मरी हुई प्रकाशित हुआ था। अपने समय से बहुत आगे का उपन्यास…

अर्पण कुमार की पाँच कविताएँ

आज पढ़िए अर्पण कुमार की कविताएँ। अर्पण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखते हैं। नियमित कविताएँ भी लिखते हैं। उनकी कविताओं के…

दलित स्त्रियों की आवाज़ ने देश को ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाया है- हेमलता महिश्वर

9 मार्च को जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर स्त्री लेखन पर एक सेमिनार का…

ईरानी सिनेमा : कविता, प्रतिरोध और मानवीय सत्य की कला

आज पढ़िए ईरान की सिनेमा परंपरा और वहाँ के कुछ विश्व प्रसिद्ध फ़िल्मकार एवं उनकी फ़िल्मों पर यह लेख। लिखा…

पहाड़ का काव्यात्मक आख्यान: रिक्तियों में पहाड़

हाल ही में अशोक कुमार का काव्य संग्रह ‘रिक्तियों में पहाड़’ प्रकाशित हुआ है। इस किताब से हमारा त’आरूफ़ करा…

बैचलर्स किचन: व्यंजन की नहीं, अनुपस्थिति की किताब

हाल में मीडिया विशेषज्ञ विनीत कुमार की किताब आई है ‘बैचलर्स किचन: अपना स्वाद, अपना अन्दाज़’। अपने ढंग की अकेली…

प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’

अकेलापन व्यक्ति को किस हद तक निराश कर सकता है इसका अनुमान प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’ को…

इतिहास, स्मृति और लेखकीय संवेदना का संतुलन: ‘इतिहास की थाली’

हाल में ही पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ प्रकाशित हुई है। लेखक अनिमेष मुखर्जी की यह किताब…

लोक और शास्त्र के मेलजोल की किताब ‘नैनन में आन-बान’

27 फ़रवरी की शाम पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘नैनन में आन-बान’ पर बातचीत हुई। दिल्ली के…

*अंधकार में मोमबत्तियों की तरह होना* 

हाल में रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय कविता का आयोजन किया गया है। ‘संसार’ शीर्षक से आयोजित इस आयोजन की संक्षिप्त…

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