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  • ‘अगम बहै दरियाव’ से गुजरते हुए:प्रेमकुमार मणि

    वरिष्ठ लेखक शिवमूर्ति के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ पर यह टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ लेखक प्रेम कुमार मणि ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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    शिवमूर्ति के उपन्यास ‘ अगम बहै दरियाव ‘ की चर्चा सुन रहा था. मेरे पास जो प्रति है उसके कवर पृष्ठ पर ही छपा है छह माह में दूसरा संस्करण. निश्चय ही यह उपन्यासों का स्वर्णकाल है. पिछले पखबारे ही खबर छपी थी कि विनोदकुमार शुक्ल के किसी उपन्यास की रायल्टी तीस लाख रूपए मिली है. हिन्दी गरीबों की जुबान है. इस जुबान के लेखकों को इतनी रायल्टी मिलना किसी को अचरज में डाल सकता है. यह कबीर, रैदास और प्रेमचंद की जुबान है. यहाँ जीने केलिए चदरिया बुननी पड़ती है, जूते गांठने पड़ते है या मास्टरी करनी पड़ती है. हमारे लेखक मांग कर खाने और मस्जिद में सो जाने वाले होते हैं. बहुत ऊँचा ख्वाब नहीं पालते. इसलिए छह माह में दूसरे संस्करण की बात देखी तब मुझे लगा उपन्यास में कुछ है.
    अगम बहै दरियाव आकार में बड़ा है. लगभग छह सौ पृष्ठों का. फैले हुए वितान के कारण केन्द्रीयता का अभाव बार-बार अनुभव कर रहा था. कुछ माह पूर्व शम्सुलर्रहमान फारुकी का उपन्यास ‘ कई चाँद थे सरे आसमाँ, ‘ पढ़ते हुए भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ था. वह भी कोई साढ़े सात सौ पृष्ठों का है.
    कोई कृति अपने आकार से नहीं, अपने सरोकार से विशिष्ट बनती है.’ कई चाँद थे सरे आसमाँ ‘ पढ़ने के बाद भी मेरा यही निष्कर्ष था. वह उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के दिल्ली की कथा है, जब मुगलिया सल्तनत अवसान के करीब था. कहानी सामंत परिवार की खूबसूरत छोरी वजीर खानम पर केंद्रित है, जिसकी कथा-क्रम में चार दफा शादियां होती हैं. फारुकी बहुत विद्वान आदमी थे. लेकिन मुझे पता नहीं चला कि इस उपन्यास में वह कहना क्या चाहते हैं. मिर्ज़ा हादी रुस्वा का उपन्यास ‘ उमराव जान अदा ‘, जो शायद उर्दू साहित्य का पहला उपन्यास है, भी उसी कालखंड पर है. आकार में छोटा, किन्तु सरोकार में बड़ा. उस से ज़माने की एक ऐसी तस्वीर मिलती है, जो उस दौर पर काम करने वाले किसी इतिहासकार के लेखन में नहीं दिखती. लेखक का असल काम यही दिखलाना होता है. कवि विशाख दत्त के मुद्राराक्षस से मौर्यकाल और कालिदास के मालविकाग्निमित्रम से शुंगकाल की वह जानकारी हमें मिलती है जो इतिहासकारों से नहीं मिलती. लेखक समय के पार जाकर अपने वर्णित समय को देखना चाहता है. लेखक का काम यथार्थ का चित्रण भर नहीं होता , वह उसका मीमांसक भी होता है. यदि नहीं होता तो उसे होना चाहिए. रेणु का ‘ मैला आँचल ‘ इसका उदाहरण है. राष्ट्रीय आंदोलन के अवसान और आज़ादी के प्रथम उन्मेष को वह समेटे हुए है. इस उपन्यास में राष्ट्रीय आंदोलन की गुत्थी तो खुलती ही है इसकी विवेचना भी मिलती है कि लोकतंत्र का विकास गाँवों के रूढ़िवादी ढाँचे को तोड़ने में सहायक हो सकता है. यह भी कि लोकतंत्र और गाँव के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है. पश्चिम के समाज-विज्ञानी सशंकित थे कि जड़ता भरे गाँवों से होकर लोकतंत्र का विकास संभव होगा या नहीं ?
    ‘ अगम बहै दरियाव ‘ मैला आँचल की तरह ही लोक जीवन में गहरे धंसा है. मार्क्सवादी शब्दावली में यह यथार्थवादी उपन्यास है. इसके केंद्र में गाँव, गरीब और किसान हैं. फिर है 1970 से लेकर 1990 के बीच का वह ग्रामीण जीवन जिसे लेखक ने देखा-समझा और लिखा है.
    शिवमूर्ति समर्थ किस्सागो हैं. जो लोग शिवमूर्ति से परिचित है वह इनके इस व्यक्तित्व से भी अवगत होंगे. उनके पास बैठिए नहीं कि उनका कथा-प्रवाह आरम्भ हो जाता है. रेणु में भी यह गुण था. उनका ऑब्जर्वेशन इतना प्रभावशाली था, मानो वह घटनाओं की फोटोग्राफी करते हों. वह उसे सुनाते भी वैसे ही थे. शिवमूर्ति में भी यह गुण घनीभूत है. वह लोक जीवन के अनेक कथा-प्रसंग को जब सुनाते हैं तो कोई भी अभिभूत हो सकता है. काव्य-रस की तरह कथा-रस भी होता है और इसे अनुभव करना तनिक मुश्किल भले हो, प्रभाव गहरा होता है. काव्य की तरह कथा में भी अंतरराग होता है. अगम बहै दरियाव भी कथा-रस से खचित है और एक सामान्य पाठक इससे अभिभूत हो सकता है.
    उत्तरभारतीय, विशेष कर पूर्वी उत्तरप्रदेश के परिदृश्य पर उभरा एक गाँव है बनकट. एक अनाम नदी कल्याणी उसे कुंडली मार कर घेरे हुए है. इसके दक्षिणी छोर पर दलितों की बस्ती सियरहवा टोला है, जिसकी अपनी ही अंतर्कथा है. इसी बनकट गाँव को लेकर यह उपन्यास है. बनकट कोई प्रसिद्ध गाँव नहीं है. छोटे सीमान्त किसानों का गाँव, जहाँ कोई जमींदार- जागीरदार नहीं है. कुछ ऊँची कही जाने वाली जाति के किसान जरूर हैं, जो हल का मूठ पकड़ना और जुताई-गुड़ाई करना पाप समझते हैं. खेतिहर मजदूरों से अपनी खेती करवाते हैं जो दलित पिछड़ी जातियों के होते हैं. छोटे किसानों पर वर्चस्व रखने और उनकी भूमि हड़पने के लिए ये तथाकथित बड़े लोग तत्पर रहते हैं. दूसरों से कुछ ऊँचा दिखने केलिए ये जी-जान लगाए हुए होते हैं. पूंजीवादी जमाने में खेती के उत्पादों के बल पर वर्चस्व कायम रखना मुश्किल है, अतएव ईंट भट्ठा जैसे कुछ कारोबार चलाना भी जरूरी होता है. जब भट्ठा चलता है तो उसके साथ अपराध भी चलता है.
    मुख्य तौर पर कहानी सीमांत किसान संतोखी और उसी गाँव के छत्रधारी सिंह के बीच की है. संतोखी पिछड़े और छत्रधारी अगड़े जमात से आते हैं. कहानी 1970 के दशक से शुरू होती है. आपातकाल है. बनकट का नागरिक जीवन ऊंघ रहा है. हर वयस्क को वोट का अधिकार मिला है लेकिन पुरानी दुनिया के सामंती प्रेत लोकतंत्र को घेरे बैठे हैं. कोर्ट-कचहरी और नाना प्रकार के सरकारी दफ्तर खुले हैं, लेकिन इन सबके होते संतोखी जैसे मामूली किसान के खेत पर छत्रधारी सिंह जालसाजी कर के कब्ज़ा जमा लेता है, हल चला देता है. पूरे अट्ठाइस साल के कठिन क़ानूनी संघर्ष के बाद कानून उसका दखल तो बहाल करवा देता है, थाना कब्ज़ा दिलाने का स्वांग भी कर जाता है, लेकिन संतोखी बड़े उमंग से जब उस खेत पर फसल लगा चुका होता है तो एक रोज छत्रधारी सिंह का भतीजा कुछ लोगों के साथ आता है और फसल तहस-नहस कर संतोखी की बुरी तरह पिटाई भी करता है. छत्रधारी का भतीजा कहता है , ‘ यह बँदुखिया देख रहा है ? यह सारी कोर्ट कचहरी से ऊपर है. ” ( पृष्ठ 369 )
    संतोखी कानूनी तरीके से, ‘ संवैधानिक’ तरीके से, अपने खेत केलिए, अपने वजूद केलिए, संघर्ष कर रहा है और छत्रधारी सिंह बंदूक़ को सारी कोर्ट-कचहरी से ऊपर मान कर धौंस जमा रहा है. लोकतंत्र के ऊपर बंदूक़-तंत्र हावी है. कथाकार की दृष्टि में लोकतान्त्रिक भारत का यही वास्तविक संघर्ष है.
    संतोखी और छत्रधारी के इस संघर्ष के बीच बनकट के ग्रामीण जीवन में बहुत कुछ है. जाने कितने भूसी, कितनी सोना के अरमान ध्वस्त होते हैं. इन्हीं सब के बीच एक है जंगू, जिसके पूरे परिवार को छत्रधारी ने रौंद डाला है. पिटाई से उसका पिता मर गया. दलित तबके का जंगू पढ़ाई में अव्वल है. लेकिन एक लम्बे घटना-चक्र के बाद अंततः बनता है डाकू. जो न्याय कोर्ट कचहरी, थाना पुलिस नहीं दे पाता उसे जंगू की बंदूक संभव करती है. और इस तरह बंदूक के बरक्श बंदूक ही न्याय संभव कर पाता है. वोट की राजनीति दलित-पिछड़े तबकों को अधिक से अधिक मुख्यमंत्री जरूर देता है, जो अवसर पाते ही बड़े लोगों की गिरफ्त में आ जाते हैं. ब्रह्मा विष्णु महेश को न मानने की कसम दिलाने वाली पार्टी का नारा बदल कर’ हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु महेश हैं ‘ हो जाता है और सियरहवा टोले के जुझारू दलित नेता तूफानी की जगह राष्ट्रीय पार्टी की दो बार विधायक रही कमला चौधरी को एक करोड़ रुपए लेकर बहन जी की पार्टी प्रत्याशी घोषित कर देती हैं. ऐसे में उत्पीड़ित जनता के वास्तविक नायक फूलन देवी और जंगू जैसे लोग हो जाते हैं, जिन्हें थाना-पुलिस-अख़बार डकैत कहते हैं. अंततः डकैत ही उत्पीड़ित मानवता के उद्धारक और वास्तविक जननायक हो कर उभरते हैं. उत्पीड़ित जनों के दिल की धड़कन और उनकी उम्मीद बन कर यही डाकू उभरते हैं. लोकतंत्र की वास्तविक तस्वीर यह है.
    उपन्यास दो परिवर्त में है. पांच सौ अट्ठासी पृष्ठों में फैला हुआ. सब कुछ यथार्थ है का फलसफा स्वीकार भी लिया जाय तो क्या यहाँ उसका अतिरेक नहीं है ? यह प्रश्न इसे पढ़ते हुए बार- बार मन में घुमड़ता है. यथार्थ का यह अतिरेक दरअसल उसका अजीर्ण बन जाता है और ऊब पैदा करता है. लोक गीत, मुहावरे और जनजीवन की विविध छवियों के प्रस्तुतीकरण की एक सीमा होती है. एक सीमा तक इनका होना यथार्थ को प्रामाणिक बनाता है. लेकिन चाय में चीनी, या दाल में नमक कितना हो इसका ख़याल रखना होता है. अवांछित की अत्यधिक उपस्थिति किसी रचना को कूड़ा बना सकती है. यथार्थ का अतिरेक किसी रचना का सिरदर्द भी हो सकता है. इसे साधना भी एक कला है. कुछ भी रख देना यथार्थवादी होना नहीं है. अफ़सोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि यथार्थ चित्रण में संयम का अभाव स्पष्ट दीखता है. सोना का विवाह और उसके फौजी पति द्वारा एक युवा का शंका में किये गये क़त्ल का विस्तृत वर्णन देना जरूरी नहीं था. उसी तरह जंगू की पुलिस द्वारा पिटाई में उसके कोमलांग में लाठी घुसेड़ने का लम्बा वर्णन फिजूल है. ऐसे ‘ सांगोपांग ‘ वर्णन लेखन के औचित्य पर ही प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं. इसलिए कहना चाहूंगा उपन्यास की सब से बड़ी कमी इसका सुसम्पादित न होना है.
    लोक-जीवन की गाथा फणीश्वरनाथ रेणु ने भी लिखी है. उन्होंने एक समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक मिथ्याचार को गहराई से समझा था. इसलिए वह अपने मैला आँचल में इस मिथ्याचार को पकड़ पाते हैं.कि किस तरह आपस में लड़ने-झगड़ने वाले सिपहिया टोले और गुआर टोले के लोग अपने से अधिक कमजोर संथाल आदिवासियों के खिलाफ संघर्ष में एकजुट हो जाते हैं. या बारहों बरन के लोगों से भरे मेरीगंज में एक निर्जात प्रशांत नायक बन कर उभरता है. यह रचनाकार की दृष्टि होती है.
    अफ़सोस है तमाम यथार्थबोध के होते शिवमूर्ति कुछ मूल्यवान कहने से चूक जाते हैं. हर मोटा आदमी ताकतवर नहीं होता और न हर लम्बा आदमी होशियार. वैसे ही उपन्यास के महत्वपूर्ण होने केलिए उसका मोटा होना, अधिक पृष्ठों का होना आवश्यक नहीं होता. कोई रचना को विशिष्ट बनाती है रचनाकार की दृष्टि. उस दृष्टि पर लेखक ने इतना खर-पतवार थोप दिया है कि वह दब गयी है. अदृश्य हो गयी है. यु. आर. अनंतमूर्ति का उपन्यास ‘ संस्कार ‘ या जैनेन्द्र का उपन्यास ‘ त्याग पत्र ‘ को यदि इस उपन्यास के लेखक ने याद किया होता तो इसे सम्पादित अवश्य करते. कहते हैं कि हेमिंग्वे का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘ द ओल्ड मैन एंड द सी ‘ मूल रूप से पांच सौ पृष्ठों में लिखा गया था, लेकिन प्रकाशन समूह के सम्पादकों ने उसका लगभग अस्सी फीसद हिस्सा हटा दिया. और हम जिस सम्पादित उपन्यास को देखते हैं उस पर मुग्ध होते हैं.
    बावजूद इन सब के इस सुदीर्घ उपन्यास के उपन्यासकार शिवमूर्ति को बधाई देना चाहूंगा. हमारे लोकतान्त्रिक जीवन के अनेक अनछुए और दुखते प्रसंग को उन्होंने इस उपन्यास में उठाया है.

     

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