धर्मेंद्र के निधन से ऐसा लग रहा है जैसे हिन्दी सिनेमा के एक बड़े युग का अंत हो गया। प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, पूर्व अभिनेत्री, रंगकर्मी वाणी त्रिपाठी टिकू ने धर्मेंद्र को इसी रूप में याद करते हुए लिखा है- मॉडरेटर
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हिन्दी सिनेमा के इतिहास में कुछ अभिनेता सिर्फ कलाकार नहीं होते—वे युग होते हैं। धर्मेन्द्र ऐसा ही एक युग हैं। साठ के दशक की रोमांटिक सौम्यता, सत्तर के दशक का ऐक्शन क्रेज और आगे के दशकों की विकसित होती संवेदनशीलता—धरम जी ने हर दौर को गढ़ा है, समझा है और अपनी मौजूदगी से मजबूत किया है। आज जब आधुनिक बॉलीवुड की भाषा, संरचना और भाव-भंगिमा बदल चुकी है, तब धर्मेन्द्र की यात्रा को समझना भारतीय सिनेमा के विकास को समझने जैसा है।
फगवाड़ा के नज़दीक पंजाब के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मुंबई आना और संघर्ष की आग में तपकर चमक बनना आसान नहीं था। 1960 में “दिल भी तेरा हम भी तेरे”
से शुरुआत करने वाले धर्मेन्द्र में वह सादगी थी जो दर्शक को अपनी तरफ खींच लेती थी। यह “सिम्पैथी स्टारडम” की शुरुआत थी—आडंबर से दूर, सहज और दिलकश।
धर्मेन्द्र जिस समय उभरे, हिन्दी फ़िल्मों में रोमांस का चेहरा राज कपूर-देव आनंद-दिलीप कुमार की तिकड़ी तय कर रही थी। धर्मेन्द्र ने इसे बदला— उनकी आँखों में संकोच, संवादों में अदबी नफ़ासत, और स्क्रीन पर एक विरह भरी कोमलता।
“अनुपमा”, “सत्यकाम”, “चुपके चुपके”, “काजल”, “मीठी मीठी बातें” जैसी फ़िल्में उनके रोमांटिक और भावनात्मक कलाकार की परंपरा की मिसाल बन गईं। “सत्यकाम” आज भी भारतीय सिनेमा के बेहतरीन परफॉर्मेंस में शुमार है।
सत्तर के दशक में भारतीय समाज बदला—नयी बेचैनी, क्रोध और हिंसा बड़े पर्दे पर दिखने लगी। धर्मेन्द्र इस बदलाव के चेहरे बने। “शोले”, “शोले के वीरू”, “यादों की बारात”, “धरम वीर”, “रज़िया सुल्तान”, “कुट्टी पिस्सी”—इस दौर में उन्होंने ऐक्शन को ग्लैमर, शक्ति और सहजता दी।
आज के अभिनेता—सलमान खान, अक्षय कुमार से लेकर टाइगर श्रॉफ—जिन्हें “मास अपील” का ताज पहनाया जाता है, उसकी बुनियाद धर्मेन्द्र ने ही रखी थी। भारतीय सिनेमा को “एक्शन हीरो” की परंपरा देने वाले धर्मेन्द्र ही थे।
वीरू की वह मासूम शरारत—
“बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना!”
—दर्शक के दिल का हिस्सा बन चुकी है।
“शोले” सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक सांस्कृतिक घटना है। एक ऐसा टेम्पलेट जिसने आधुनिक बॉलीवुड की कहानी कहने की शैली तय की—डायलॉग, कैरेक्टर आर्क, मल्टी-स्टार फॉर्मेट, मार्केटिंग और सिनेमाई मिथक।
इस फिल्म में धर्मेन्द्र ने रोमांस, कॉमिक टाइमिंग और ऐक्शन—तीनों को एकसाथ बाँधा, जो आज भी रेफरेंस पॉइंट है।
किसी एक हीरो में रोमांस, ड्रामा और ऐक्शन के साथ इतनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग मिलना दुर्लभ है।
“चुपके चुपके” में उनका प्रोफेसर बनना— बिना शोर किए हँसाना, बिना ज़ोर लगाए दृश्य चुरा लेना, और हास्य को उच्च स्तर तक ले जाना- यह हर पीढ़ी को याद रहेगा।
धर्मेन्द्र उन गिने-चुने अभिनेताओं में से हैं जिन्होंने पाँच दशकों तक—
सुपरहिट्स दीं, दर्शकों को बाँधे रखा, और बदलते बॉलीवुड को अपने भीतर समाया।
1990 के दशक में आई “घायल”, “दामिनी” और “घातक” में उनकी उपस्थिति ने सनी देओल की फिल्मों में भावनात्मक गहराई जोड़ दी। आज भी वे स्क्रीन पर आते हैं तो अपनापन, स्मृतियाँ और वो पुराना सिनेमाई जादू लौट आता है।
धर्मेन्द्र की विरासत सिर्फ उनकी फ़िल्में नहीं।
उनका प्रभाव इन रूपों में दिखता है—
- हीरो की ‘माचो’ इमेज का ढाँचा वह टेम्पलेट जिसने बाद में सलमान खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन, ऋतिक रोशन जैसे सितारों की राह खोली।
- संवादों में सादगी और दिल की भाषा उनका ऑन-स्क्रीन व्यवहार और बोलचाल आधुनिक ‘हिंदी-मिश्रित’ संवादों की नींव बना।
- मल्टी-स्टार युग की शुरुआत
“शोले”, “यादों की बारात”, “राजा जानी” जैसी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में एंसेंबल कास्ट की मॉडर्न फॉर्म को लोकप्रिय किया।
धर्मेन्द्र की विरासत कहानियों से आगे बढ़कर एक परिवार की कला-परंपरा में बदल गई—
धर्मेन्द्र → सनी देओल → करण देओल / राजवीर देओल।
यह भारतीय सिनेमा की सबसे स्थायी और सम्मानित लाइनएज में से एक है।
उनकी छवि भले ही मजबूत, मर्दाना और शौर्य से भरी रही, पर दिल हमेशा मुलायम रहा।
स्क्रीन पर उन्हें देखना मतलब— सहज गर्मजोशी, सच्चाई और एक मेले जैसा अपनापन।
आज के सुपरस्टार भले तकनीकी रूप से ज़्यादा कुशल हों, पर धर्मेन्द्र जैसा दिलकश और नैसर्गिक आकर्षण दुर्लभ है।
छह दशकों का सफर, सौ से अधिक यादगार फ़िल्में, अनगिनत किरदार—पर धर्मेन्द्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारतीय दर्शक को हमेशा “घर जैसा” एक हीरो दिया।
इंडस्ट्री बदल गई, किस्मतें बदल गईं, तकनीक बदल गई— पर धर्मेन्द्र की चमक आज भी उतनी ही निर्मल और जीवंत है। वे सिर्फ एक सितारा नहीं—बल्कि एक युग हैं, एक भाव हैं, एक स्मृति हैं।
उनकी स्मृति को शत-शत नमन।

