विवाह संस्था की नींव स्त्री-पुरुष पर टिकी रहती है, यह तो सामान्य सी बात है लेकिन प्रत्येक स्त्री-पुरुष की स्थिति एक-दूसरे से भिन्न ही होती है। कुछ बातें ऐसी भी हैं जहाँ प्रत्येक ‘जोड़ी’ समान भौतिक इच्छा रखती है, वह है अपने घर का होना। रोटी, कपड़ा, मकान तो किसी भी व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरते हैं लेकिन इस विडंबना से हम सब वाक़िफ़ हैं कि इनकी आपूर्ति भी सबों तक नहीं हो पा रही है। उस पर से यह भी कि ज्यों-ज्यों बाज़ारवाद का विकास होते जा रहा है त्यों-त्यों हमारी माँगें भी बढ़ती जा रही हैं, उससे भी अधिक…
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जानकी पुल की युवा संपादक अनुरंजनी ने संपादन के अपने अनुभवों को साझा किया है। पढ़िएगा कितनी ईमानदारी से लिखा है उसने- मॉडरेटर =============================== ‘संपादक’, यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी का काम होता है। यों तो हमारा हर काम ही ज़िम्मेदारी वाला होता है, हमारा जीवन भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है लेकिन बतौर संपादक एक खास वर्ग के प्रति ज़िम्मेदारी का एहसास अत्यधिक होता है। वह खास वर्ग है ख़ालिस पाठक का। अब उस पाठक वर्ग में चाहे कोई भी हो, अन्य लेखक/आलोचक भी जब उसे पढ़ रहे हैं तो वे पाठक की भूमिका में ही होते हैं। मेरा यह काम…
मेरे भीतर के पाठक को कथा से पहले वातावरण जानना होता है कि कथा के पात्र आखिर विचरते कहां हैं, क्योंकि वातावरण उन्हें बनाता है। ग्रामीण हैं तो जीवन धीमी गति और सहनशील धैर्य के साथ चलेगा और आप अपनी नब्ज़ सेट कर लेंगे। पात्र का परिवेश महानगर है तो एक बेचैनी पर आपकी नब्ज़ सेट होगी। इस वातावरण गढ़न के माहिर मेरे समकालीनों में कोई हैं तो वे पंकज सुबीर हैं। ‘चोपड़े की चुड़ैलें’ कथा ने मुझ पर इसी महीन विवरणात्मक परिवेश के कारण गहरा असर डाला था। उनकी कहानियां विविध परिवेशों की कहानियां हैं…. एकदम माजिद मजीदी की फिल्मों…
पेशे से कॉरपोरेट मजदूर, अनुपमा शर्मा एक अलग पहचान की तलाश में हैं। इस तलाश के सफर में अपने विचारों को कविता रूप में ढाल कर उनकी अभिव्यक्ति करने की चेष्टा करती हैं। दिल्ली निवासी अनुपमा का यह कहीं भी उनकी कविताओं के छपने का पहला अवसर है। लेखन के अतिरिक्त वे अध्यात्म में रुचि रखती हैं। तितलियाँ देखो एक खुले बाग़ में ओस पड़ी ठंडी घास पर हाथ फैलाए एक परछाई खड़ी है स्थिर जैसे किसी की प्रतीक्षा करती है देखो एक एक करके ढेरों रंग बिरंगी तितलियाँ उस खुले हाथ पर आ बैठी हैं उड़ती नहीं, बस उसके…
कल की बात है। जैसे ही मैँने महफिल मेँ कदम रखा, गौरव त्यागी मिल गए। गौरव त्यागी का बहुत गौरवशाली अतीत है। पिछली कम्पनी मेँ भी हमारे साथ थे, इस कम्पनी मेँ भी हमारे साथ हैँ। एक सहकर्मी के जन्मदिन की पार्टी मेँ दोपहर के खाने पर हम सब इकट्ठे हुए थे। गौरव त्यागी हमेँ देखते ही गले से लगे। साथ खड़ी महिला सहकर्मी से हमारा परिचय कराने लगे। हम उन देवी जी को जानते नहीँ थे और उनके सामने अपनी हो रही तारीफ से हम शर्मिन्दा हुए जा रहे थे। चुनाँचे हमने बात का रूख मोड़ दिया और पुरानी…
आज रंजिता सिंह ‘फ़लक’ की कुछ प्रेम कविताएँ प्रस्तुत हैं, जिनसे हमारा परिचय करा रहे युवा कवि आशुतोष प्रसिद्ध। यह देखना सुखद है कि स्त्री की प्रेम कविता पर एक पुरुष इतना सहज और सुलझी हुई टिप्पणी दे रहा है। आप भी पढ़िए- अनुरंजनी ============================================= कामनाओं और इच्छाओं को पर्दे की ओट से महसूस करने वाला समाज यकायक किसी भी स्त्री स्वर की मुखरता स्वीकार करने में संकोच ज़रूर कर सकता है, पर उसे बेतर्क और अमर्यादित कहकर नकारने का समय अब बीत चुका है। स्त्रियां विचारों में खुल रही हैं, महसूस किया हुआ कह रही हैं। रंजीता सिंह ‘फ़लक’…
इरशाद ख़ान सिकन्दर शायर हैं, आजकल उनके नाटकों की धूम मची हुई है। वे बहुत अच्छे क़िस्सागो भी हैं। यक़ीन न हो तो यह कहानी पढ़िए- मॉडरेटर =============================== नेटवर्क की समस्या के कारण बात करते-करते हनी बालकनी की तरफ़ आ गयी तभी सामने वाले घर से किसी प्रौढ़ महिला की आवाज़ सुनायी पड़ी। ‘’पहले प्याज़ छीलकर काट लो बारीक-बारीक, उसके बाद लाल होने तक भून लेना’’। और एक बुज़ुर्ग आकृति इधर-उधर डोलने लगी। हनी ने आकृति की तरफ़ ध्यान न देते हुए अपनी बात जारी रखी। ‘’सब मर्द साले एक से होते हैं। अनाड़ी नहीं हूँ मैं। और सुन! तू…
लगता है यह समय कोरियाई साहित्य की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा का साल है। 10 अक्तूबर 2024 को हान को साहित्य का नोबेल मिलने की घोषणा वाले दिन ही यानी 10 अक्तूबर को ही कोरियाई अमेरिकी लेखिका किम जू हे को उनके पहले उपन्यास ‘बिस्ट्स ऑफ ए लिटिल लैंड’ के लिए रुस का ‘यासनाया पोलयाना लिटरेरी अवार्ड फॉर फॉरेन लिटरेचर’ का पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार की स्थापना साल 2003 में लियो टोलस्टॉय के 175वें जन्मदिवस के अवसरा पर यासनाया पोलयाना लियो टोलस्टॉय एस्टेट-म्यूज़ियम और सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा किया गया था। किम जू हे के अलावा इस पुरस्कार के शॉर्ट लिस्ट में 10…
आज दशहरा है। आप सभी इसकी शुभकामनाएँ। आज पढ़िए राम-रावण युद्ध पर संजय गौतम का यह व्यंग्य लेख। संजय गौतम दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और मूलतः व्यंग्यकार हैं। आप उनका यह लेख पढ़िए- मॉडरेटर ============================= दशहरा आते ही मेरी आध्यात्मिक प्रवृत्ति जागृत होने लगती है। उसका कारण बस यह है कि पाप-पुण्य के सवाल पर माथा चकराने लगता है। लगता है जो पाप हम किए जाते हैं उनकी तुलना में पुण्य, पता नहीं, आसपास भी ठहरेंगे या नहीं। पता नहीं, विधाता क्या फैसला करेंगे। उससे ज्यादा अहम सवाल यह उठता है कि रावण जैसा परमज्ञानी, शास्त्रज्ञ, शिवभक्त भी…
यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि हान कांग के पिता हान संग-वन भी कोरियाई भाषा के प्रसिद्ध लेखक हैं। पुत्री को नोबेल मिलने पर कोरियाई मीडिया में उनके पिता की जो प्रतिक्रिया आई है उसको मूल कोरियाई भाषा से हिन्दी में प्रस्तुत कर रही हैं कुमारी रोहिणी, जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में कोरियाई भाषा एवं साहित्य पढ़ाती हैं- मॉडरेटर ======================= मेरा मानना है कि किसी लेखक को उसकी भाषा का संस्कार कहीं ना कहीं उसके बचपने से ही मिल जाता है। एक लेखक यूँ ही लेखन नहीं करने लग जाता, उसके अंदर वह बीज उसके जन्म के पहले…